दफ्तर दफ्तर
शाम होने को है और घड़ी के दोनों कांटे मानो मुझे उठने का संकेत दे रही हो...
पास वाले की कुर्सी की चरचाराहट आरी की तरह दिमाग काटे जा रही थी और
मेज़ पर फ़ाइलों का शामियाना छप्पन भोग की तरह सजा था
(वैसे ये छप्पन भोग वैसा ही है जैसा उस भगवान को चड़ता है
ना उसको वो भाता होगा और ना मुझे ये ।)
दफ्तर के चुनिंदे महनती बड़े लोग कुछ लोगों की टांग खिचाई या कोई घटिया जोक को लेके ठहाका लगा रहे थे
और कुछ लोग थे जिन्हें अभी अभी काम का आभास हुआ है और अपनी व्यथा सुना रहे थे |
यहां कुछ खिलाड़ी है जो हर वक़्त चौके छक्के लगाते रहते है, और कुछ है जिन्हें सिनेमा में होना था, बाकी सब बीच के है थोड़ा इधर थोड़ा उधर |
खैर यहां संध्या तक काम होता है फिर काम होने का नाटक,
हा... हा
कहीं बार लगता है ये मैनेजमेंट वालों की बात आला अधिकारियों ने कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले ली है कि "बैंक अपना परिवार है!"
लेकिन एक और परिवार ये शायद अब भूल चुके ।

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