SOLO TRIP ( सोलो ट्रिप " धरमशाला" )

परिवार एकांकी हुए जा रहे है.. तो घूमना भी हो रहा है, कुछ नया नहीं है बस यही रीत है |

अब बात कुछ यूँ है की परिवार के साथ सबकी चलती है ,खास कर बड़ो की, तो ये जो सोलो ट्रिप का जोर चला है वो भी छोटो ने ही आगे किया है मतलब हमारी पीढ़ी ने और जो ये नई पीढ़ी है उसको किसी का सुनना है नहीं, ये आज़ाद रहना चाहती है, ख्यालों मैं उड़ना चाहती है और पता नहीं क्या क्या ... कुल मिलाकर अपने मन की करनी है चाहे जो हो |

खैर मंडी अहमदगढ़ से भागसूनाग ( McLeodganj ) तक का ये सफ़र आपके साथ आज शेयर कर रहा हूँ |

काँगड़ा घाटी 

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि क्यों कहते है अगर सही मायने मैं जानना चाहते हो तो उठाओ अपनी मोटरबाइक और चल पड़ो पहाड़ों की और, केवल एक दो घंटो मैं ही संसय दूर हो जाने है |

हिमाचल मैं प्रवेश करते ही यहाँ के पहाड़ और ठंडी हवा के झोंके आपका स्वागत करेंगे फिर धीरे धीरे ये प्रदेश आपपे जो रंगत छोड़ेगा , ज़नाब इस जनम मैं तो नहीं उतरनी |

दिन मैं यहाँ राजस्थान के सर्दियों की शाम सी छटा जान पड़ती है, खुली और हवादार...
पंजाब के खेतों कीं सी हरियाली साल भर मालूम होती है, अब भला देव यहाँ नहीं बसेंगे तो कहाँ बसेंगे ?

कांगड़ा क्षेत्र मैं प्रवेश करने के बाद जैसे जैसे उपर जाएंगे वैसे वैसे चित्त हर्ष और उल्लास से भर उठेगा और भागसूनाग के उस झरने पर जब बोद्ध सन्यासियों को ध्यान लगाते पाएंगे तो एक टक जीवन ठहर सा जाएगा  |
भगवान् शिव की झटा मैं गंगा के अवतरण के समान ये झरना पहाड़ो से चलकर भागसूनाग मंदिर परिसर के मद्य से निकलकर पुराणिक मान्यताओ को प्रमाण मैं बदलता प्रतीत होता है |
भक्तो द्वारा अनायास ही लगाए गए शंकर और शम्भो उद्गोष मैं आप इतने मंत्र्मुघ्ध होंगें की आपकी इन्द्रियां झरने के ठन्डे पानी से ही चेतन होगी |

भागसूनाग मंदिर

अब मंदिर से झरने के उद्गम तक जाने का एक छोटा सा ट्रेक है जिसको एक बैकपैक, जिसमे मेरे ट्रिप का सारा सामान था, और हेलमेट के साथ मैंने बड़ी मुश्किल से पूरा किया जिसमे अंतिम १०० मीटर तो मानो बिना साँस के निकाला हो 
झरने के थोडा उपर ही एक बहुत ही असाधारण सा कैफ़े है जिसमे पहला कदम रखते ही आपको कुछ अलग सा एहसास होगा ...  इसका नाम है "शिवा कैफ़े " स्वाभाविक सा है , भोले के दरबार मैं किसी और का नाम चले भी तो भला कैसे !

आपको इस कैफ़े के बारे मैं और जानना हो तो नीचे दिया आर्टिकल पढ़े इसमें इसके ओरिजिन और कल्ट बनने को लेकर कुछ रोचक तथ्य दिए है :-


भागसूनाग झरने का रास्ता 


वैसे महादेव का जिक्र ज़हन मैं था तो पहले बता दिया बाकी धर्मशाला मैं जाते ही पहला पड़ाव था धरमशाला का क्रिकेट ग्राउंड | 
ये क्रिकेट ग्राउंड देश का सबसे ऊंचाई पे स्थित क्रिकेट ग्राउंड है जिसने कई टेस्ट और t20 की मेजबानी की है |
जैसे ही आप बाहरी एरिया से दर्शक दीर्घा की तरफ जाएंगे आँखों को ठंडी हवा और बेमिशाल धौलाधर पहाड़ों का लुत्फ़ उठाने का मौका मिलेगा जो की इस स्टेडियम की खूबसूरती मैं चार चाँद लगा देता है | 
कई मैच देखे यहाँ के .....टीवी पे 😛... पर आज रूबरू होने का मौका मिला है |

पाकिस्तान के 2005 इंडियन दौरे से पहले पाकिस्तान टीम का ट्रेनिंग कैंप यही रखा गया था जिसपे शाहिद अफरीदी ने मजाक मैं कहा की " जनाब ये हिन्दुस्तान की शाजिश  है की हमे एसी जगह प्रेक्टिश के लिए लाए है जहाँ तो नज़ारे देखो , यहाँ तो चाय पियो और पहाड़ देखो| "  

धरमशाला क्रिकेट ग्राउंड 

स्टेडियम के बाद अगला पड़ाव था नोरबुलिंग्का बोध संस्थान !
सड़क से जैसे ही सीधे हाथ पे घूमके तिब्बती एरिया मैं पहुंचा बाइक एक तरफ लगा के पैदल चलता रहा और चलता रहा , क्यूंकि ध्यान हर चीज़ पे जा रहा था . यहाँ के लोग , उनका पहनावा रंग बिरंगी सी दुकाने  और उपर नीचे बने घर .... कुछ दूर जाके गली जब तंग हुई तो पता चला आगे आ गए. फिर किसी से पूछा तो पता चला की  थोड़ा आगे निकल आए . खैर जब मुख्य दरवाजे पे पहुंचे तो एक बला की खूब खूबसूरत सी रिसेप्शनिस्ट से भेंट हुई और बात हुई तो ऊन्होने बताया आप एंट्री फी दे दीजिये और घूम आइये पर जब मैंने बताया की अगर टिकेट मिल जाके तो अच्छा  होगा  क्यूंकि मैं ये सब यादगार के के लिए रखता हूँ तो एक मुस्कान के साथ "जब घूमके जाने का समय हो तब तक व्यवस्था कर देंगे" कहने के साथ संस्थान  का  गाइड बुक दिया  |

ये वही टिकेट और गाइड बुक है  

जब गाइड बुक पढ़ी तो पता चला एसी ही एक जगह तिब्बत मैं है जो की दलाई लामा का ग्रीष्म कालीन निवास होता था लेकिन जब से ये exile पे है तो उसी की तर्ज पे इस जगह को बनाया गया है, सोच रहा हूँ जब ये इतना सुब्दर है तो वो कैसा होगा खैर जिससे जो जगह बनती है वो ही वहां नहीं तो क्या मायने उस जगह के ..."जहाँ दलाई लामा वही वास्तविक नोरबुलिंग्का "   
यहाँ तिब्बती कल्चर को सजोने का काम किया गया है और जो हथकर कारीगरी है उसके बहुत ही सुंदर नमूने यहाँ देखने को मिलते है | यही पे एक दूकान भी है जहाँ आप यहाँ बने सामान खरीद भी सकते है |
संस्थान के बारे मैं और जानने के इच्छुक लोग निचे दिए लिंक पे जाके अपनी आतुरता को शांत कर सकते है -
ये सब लिंक जो है वो इसलिए की कही जाओ तो थोड़ा पढके जाओ, और भी ज्यादा मजा ले पाओगे.

खैर ये सब देखने के बाद मैं सिद्धपुर से थोड़ा आगे  निकल गया जहाँ बहुत ही सुन्दर मौसम ने रुकने न दिया और जा पहुचे तीन रास्ते पे | वहां रुका और हेलमेट उतारा तो बहुत लोगों की आवाज सुने दे रही थी पर दिखाई कोई नहीं दिया .... थोड़ा बहुत खोजने पे पता चला एक चलती नदी का और गर्मी मैं नहाने का मजा लेते लोगों का ... 
वहां एक भी सैलानी नहीं दिख रहा था पर अपने क्या .... अपन भी जा उतरे टूटी फूटी भाषा उनकी टूटी फूटी भाषा हमारी ...खूब मजे किये ... हाहा |  
( बाद मैं होटल मैं जब पता किया तो पता चला की ये जगह " खाडोता वेली " CORDINATES : 32.205878, 76.369851 थी |)

नहाने की बाद लगी भूख और भाईसाहब मन हुआ कुछ लोकल खाने का तो मिलाया एक दोस्त को कॉल तो उसने मोमो की दुकान बताई " किरपाल मोमो"  तो हम गिरते पड़ते पहुच गए दुकान पे .... पहले लगा गलत आ गए ...आपको भी लगेगा.., अन्दर जाते के साथ ख़तम बहार से ही ऊपर जाने के लिए गोल सीढियाँ ..भाई साहब |
पर लोग आते जाते देख लगा कुछ तो है, और जब खाया तो आनंद आ गया |

किरपाल मोमो (नाग व्यू कैफ़े )(फोटो: गूगल )
बाकी यहाँ जाओ तो कार थोड़ा पहले जहाँ जगह मिले पार्क करदो तो अच्छा... बाकि बाइक मैं कोई समस्या नहीं |
और मटन मोमो , थुक्पा , मटन सूप बहुत सही था .... आप भी मजा ले |

ये सब करने के बाद हम भाग्सू और मेक्लोड गंज देखके  ( जिसका ऊपर बता ही दिया है ) HOSTELLER  मैं रुक गए.....जहाँ बाकी सब तो ठीक था लेकिन वो 100 सीढियाँ भाई साहब .....😅 जितनी बार बाज़ार जाने की सोचोगे अलग मन बनाना पड़ेगा की जाए या न जाए  तो मैं यही सुझाव दूंगा की कही और रहने का देख लें तो बेहतर बाकी सस्ता तो यही मिलेगा 😁 ....

तो ये था हमारा धर्मशाला -- भागसूनाग ट्रिप .

फिर मिलेंगे किसी अलग थलग ट्रिप के साथ, तब टक के लिए टाटा !!!

PS:
हिमाचल
देव भूमि है बड़ी सयानी 
दिन प्रतिदिन बढ़ती हरियाली
झूम के आओ झूम के जाओ 
कर दुविधाओं की कुर्बानी

चिंता हो या हो कोई पीड़ा
उनका एक बनाले बीड़ा
फिर इस बीडे को सरकादे
किसी पहाड़ नदियां मैं भीरा

जाना होगा जब तेरा तो 
साथ चलेगी ये पुरवाई
याद चलेगी इस धरती की
और चलेगा नया सवेरा !!!
- कुंवर पुष्पेन्द्र 





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